वक्त भी बदले और ताज भी बदले मगर बदल न सकी कई गांवों की तस्वीर

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देश अपनी आजादी के 73 वें वर्ष में प्रवेश कर रहा है और लोकतंत्र भी अपने स्थापना के 17 वें चरण में है।इस बीच देशवासियों ने कई सरकार के कार्यकाल को भी देखा तथा उनके वादों और दावों से रूबरू हुए।बावजूद इसके आज भी देश के कई ऐसे गांव हैं जो विकास की अवधारणा से कोसों दूर हैं।दलितों के उत्थान एवं अंतिम पायदान तक विकास के बड़े बड़े दावे करने वाली सरकारो के दावों की पोल उस वक्त खुलती नजर आने लगती है जब वैसे गांवों के ग्रामीणों से मुलाकात होती है और वे अपने दर्द को बयां करते हैं।

इन गांवों में यदि मीडिया की टीम पहुंचती है और तस्वीर खींचने के बाद उनकी समस्याओं से रूबरू होने की कोशिश करती है तो ग्रामीणों के चेहरों के भाव इतना बतलाने के लिए काफी होते हैं कि वे विकास एवं सरकारी योजनाओं से कितने महरूम है और उसे पाने की चाहत सिद्दत से महसूस कर रहे है।दोपहर का समय था और हमारी टीम जैसे ही औरंगाबाद जिले के मदनपुर प्रखंड के नीमा आंजन पंचायत के एक गांव कोइलवां पहुंचती है वैसे ही गांव के बाहर चबूतरे पर बैठे कई ग्रामीणों की एक्सरे भेदी आंखे हमसबों को निहारती नजर आती है।धूप की तपिश भी पल भर में शरीर को जलाने को आतुर हो रही थी।तभी टीम के एक सदस्य ने अपनी प्यास पूरी करने के लिए पानी की मांग की।चबूतरे पर बैठा एक युवक तेजी से उठा और पास ही सड़क के किनारे गड़े एक चापाकल से पूरी बाल्टी पानी लेकर पहुंचा।टीम के सदस्यों ने उस पानी से अपनी प्यास बुझाई।पता चला कि पूरे गांव में मुश्किल से दो चापाकल ही है और तकरीबन ढाई सौ की आबादी वाली यह बस्ती उसी से अपने पानी की कमी को पूरी करती है।यह गांव सरकार के द्वारा दिये जा रहे सुविधाओं से कोसों दूर है।सिर्फ कोइलवां ही नही बल्कि इस पंचायत के आस पास के कई ऐसे गांव है जहां के युवा रोजगार एवं अपनी पारिवारिक जरूरतों को को पूरा करने के लिए पलायन को मजबूर हैं।लगभग 45 घरों की आबादी वाला यह गांव जहां सिर्फ भुइयां परिवार के लोग रहते है और किसी प्रकार पंचायत के संपन्न किसानों की जमीन को पट्टे पर लेकर कई पुस्तों से खेती कर अपना भरण पोषण कर रहे है।

गांव के ही महेश भुइयां जो नेपाल के एक बड़े बिल्डिंग कंस्ट्रक्शन कंपनी में सीरिया बेन्डिंग का काम करते हैं ने बताया कि उनके गांव में एक भी घर ऐसा नही है जो पक्के का हो।यहां न तो सरकार की उज्ज्वला योजना का लाभ मिला है और न ही प्रधानमंत्री आवास योजना का।इतना ही नही यहां बिहार सरकार के द्वारा चलाई जा रही सात निश्चय योजना के नली गली,नल जल और न ही शौचालय का लाभ मिल सका है।उन्होंने बताया कि आजादी के बाद से आज तक इस गांव में न तो किसी विधायक ने कदम रखा है और न ही सांसद ने।हा लोग वोट जरूर देते है ताकि किसी की नजर फिरे और इस गांव का उत्थान हो जाए।आस पास के क्षेत्रों में रोजगार के कोई साधन न होने से अधिकतर युवा पलायन कर चुके है और जो बचे हैं वह मजदूरी कर अपने परिवार की परवरिश कर रहे हैं।ग्रामीण मुखिया,जिला पार्षद एवं सरपंच को जानते है और उन्ही से अपनी समस्या बताकर निराकरण करते हैं।गांव के दिव्यांग नरेश भुइयां बताते है कि कई चुनाव से एक भी जनप्रतिनिधियों ने अपना दर्शन नही दिया।अभी हाल ही में 17 वीं लोकसभा के प्रथम चरण का चुनाव सम्पन्न हुआ है और इस चुनाव में नेताओं के द्वारा दलितों के विकास के दावों का उल्लेख कितना सच हैं वह यहां आकर देखा या समझा जा सकता है।

 

मामले में जिलाधिकारी राहुल रंजन महिवाल ने बताया कि लोकसभा चुनाव 2019 को लेकर लागू अचार संहिता के कारण कई लाभार्थियों को केंद्र या राज्य संपोषित योजनाओं का लाभ ग्रामीणों तक पहुंचे ऐसी सोच सरकार रखती है परंतु आदर्श आचार संहिता लागू हो जिससे कई कार्य सम्पादित नही हो पा रही है।उन्होंने कहा उन्हें भी यह मालूम है कि कई गांवों में लाभार्थियों तक योजनाओं का लाभ नही मिल पाया है।लेकिन 23 मई को जैसे ही आचार संहिता समाप्त होती है वैसे ग्रामीणों तक उसका लाभ पहुंचाया जाएगा।

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